हरियाणा का प्राचीन इतिहास | Haryana Ancient History Gk in Hindi

 

            हरियाणा का प्राचीन इतिहास |  Haryana Ancient History Gk in Hindi

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● हरियाणा शब्द का अर्थ भगवान का निवास जो संस्कृत शब्द हरि (भगवान विष्णु) और अयण (निवास) से मिलकर बना है ।

● मुनीलाल, मुरलीचंद शर्मा, एच.ए. फडके और सुखदेव सिंह छिब जैसे विद्वानों के अनुसार हरियाणा शब्द की उत्पति हरि (संस्कृत , हरित , हरा) और अरण्य (जंगल) से हुई है ।

● सबसे पहले हरियाणा शब्द का प्रयोग संसार के सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में रज हरयाणे के रूप में हुआ ।

● हरियाणा का पहला प्रादेशिक नाम ब्रहावर्त था ।

● महाभारत काल ( Mahabharata period) में राजा कुरु के नाम पर ब्रह्मावर्त को कुरुक्षेत्र और आर्यव्रत कहा गया ।

● हरियाणा के प्राचीन नाम - 
ब्रह्मावर्त, ब्रह्मा की उत्तरवेदी, रज हरियाणे, हरियाणऊ, बहुधान्यक, हरियाल, धरती का स्वर्ग ।

● 10 वीं शताब्दी में पुष्यदंत ने महापुराण में पहली बार 'हरियाणऊ' शब्द का उपयोग किया तथा श्रीधर ने पासणाहचरित्र में इस प्रदेश की चर्चा की ।

● दिल्ली में राष्ट्रीय संग्रहालय में 1338 ईसवी के एक शिलालेख की पंक्तियां हरियाणा शब्द की पुष्टि करती है । इस शिलालेख में हरियाणा को धरती का स्वर्ग कहा गया है ।

● वामन पुराण में हरियाणा में प्रवाहित होने वाली नदियों झीलों सरोवर और वन क्षेत्रों का वर्णन है खासकर ब्रह्म सरोवर का ।

● हरियाणा को आदि सृष्टि का जन्म स्थान भी माना गया है ।

● बोहर गांव (रोहतक) से मिले शिलालेख पर हरियाणा शब्द का अंकन है ।

● 1337 विक्रम संवत (58 वर्ष पीछे) के दौरान का अभिलेख प्राप्त हुआ है, जो हरियाणा से संबंध रखता है । इस अभिलेख का संबंध बलबन से है ।

● विभिन्न विद्वानों द्वारा हरियाणा को दिए गए नाम-

महाभारत के समय - बहुधान्यक 
हर्ष चरित्र (बाणभट्ट - श्रीकंठ जनपद 
राहुल सांकृत्यायन - हरिधानक्या 
डॉक्टर बुद्ध प्रकाश -  अहिर याणा 
महाराज कृष्ण - हरना (लूटपाट)

● अन्य नाम -

अभिरायण - अहीरो का घर
हरित अरण्य - हरा भरा वन
हर का अरण्य - भगवान शिव का घर

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हरियाणा प्राचीन इतिहास के स्त्रोत | Sources of Haryana Ancient History 

हरियाणा के इतिहास को जानने के लिए ऐतिहासिक स्त्रोतों को जानना बहुत जरूरी है ऐतिहासिक स्त्रोतों को तीन भागों में बांट सकते हैं - साहित्यिक स्त्रोत,  पुरातात्विक स्त्रोत, मौद्रिक साक्ष्य

1) साहित्यिक स्त्रोत- 

                                A) भारतीय स्त्रोत
                                B)  विदेशी स्त्रोत

A) भारतीय स्त्रोत-

● ब्राह्मण ग्रंथों से पता चलता है कि ब्राह्मण, उपनिषद् आदि की रचना हरियाणा में हुई ।

● ऋग्वेद- 

ऋग्वेद विश्व का सबसे प्राचीन ग्रंथ है । जिससे हरियाणा प्रदेश की भौगोलिक जानकारी मिलती है । ऋग्वेद से पता चलता है कि आर्य लोग सरस्वती और दृष्दति (घग्गर) नदियों के बीच रहते थे ।

● शतपथ ब्राह्मण-  

इस ग्रंथ से हरियाणा प्रदेश में रहने वाले कुरूओं का उल्लेख है, जिनके नाम पर कुरुक्षेत्र नाम पड़ा । 

● महाभारत-  

महाभारत में हरियाणा को बहुधान्यक प्रदेश कहा गया है और महाभारत में नकुल की दिग्विजय और विशेषकर नकूल के रोहतक पर आक्रमण का वर्णन है । महाभारत के अनुसार रोहतक में घोड़े और गायों की अधिकता थी ।

नोट-: महाभारत सबसे बड़ा महाकाव्य है । इसका दूसरा नाम जयसंहिता है । इसकी रचना वेदव्यास जी ने की । इसमें 1 लाख 10 हजार श्लोक हैं । 

● वामन पुराण-  

वामन पुराण में हरियाणा को कुरु जंगल कहा गया है और हरियाणा के 7 जंगलों का (काम्यक वन, व्यास वन, सूर्य वन, आदित्य वन तथा शीत वन आदि का वर्णन है । इसके साथ इसमें हरियाणा में प्रवाहित होने वाली नदियों, झीलों, सरोवरों का भी उल्लेख है । इसमें कुरुक्षेत्र के ब्रह्म सरोवर का उल्लेख खासकर है ।

नोट -: वामन पुराण वेद व्यास जी की रचना है । इसमें 10,000 श्लोक हैं ।

● बौद्ध साहित्य -  

बौद्ध साहित्य से पता चलता है कि महात्मा बुद्ध ने हरियाणा में भ्रमण किया । दिव्यवदान तथा मज्झिमनिकाय आदि बौद्ध ग्रंथों से हरियाणा के जनजीवन का उल्लेख मिलता है दिव्यवदान में अग्रोहा (हिसार) व रोहतक का पता चलता है । माज्झिमनिकाय  धनकोटा (जिला) गुड़गांव का पता चलता है ।

● जातक ग्रंथ - 

जातक ग्रंथों में कुरुक्षेत्र का उल्लेख प्रचुर मात्रा मिलता है।

● जैन साहित्य - 

जैन धर्म को पुनर्जीवित करने का श्रेय जैन साधु जिनवल्लभ हो जाता है, जो हांसी में रहते थे । जैन मूर्तियां हांसी व रानीला (दादरी पहले भिवानी में था) से प्राप्त हुई ।

● ऐतिहासिक ग्रंथ- 


1) कल्हण की राजतरंगिणी- 

इसमे बताया गया है कि कश्मीर के राजा ललित आदित्य ने यहां के राजा को हराकर यमुना से कालका तक का सारा प्रदेश अपने अधीन कर लिया था । इस ग्रंथ से यह पता चलता है कि रोहतक बहू व्यापारी संपत्ति वान था ।

नोट-: कल्हण का वास्तविक नाम कल्याण था । जिसकी पुस्तक के अनुसार कश्मीर का नाम कश्यपमेरु था । जो ब्रह्मा के पुत्र ऋषि मरीचि के पुत्र थे ।

2) पाणिनी की अष्टाध्यायी- 

इस ग्रंथ से कुरू जनपद और यौधेय जाति, जो हरियाणा में बसते थे, उनका विवरण है । इसमें हरियाणा के कुछ स्थलों जैसे- कपीस्थल (कैथल), सैरिसक (सिरसा), तोशालय (टोहाना जिला हिसार), श्रहन (सुहन), कालकूट (कालका) आदि का उल्लेख किया गया ।

3) बाणभट्ट का हर्ष चरित्र- 

इसमें कुरुक्षेत्र (स्थानेश्वर) का वर्णन है । इसमें भारतीय सम्राट हर्षवर्धन का जीवन चरित्र वर्णन है ।

नोट-: बाणभट्ट, राजा हर्षवर्धन का दरबारी कवि था ।

B) विदेशी साक्ष्य- 

● यूनानी लेखक एरियन इस क्षेत्र की आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था पर प्रकाश डालता है । उसने बताया कि यहां का प्रशासन अच्छा था । लोग युद्ध लड़ने में बहादुर थे । न्याय को विशेष स्थान दिया गया था ।

● चीनी लेखक हेनसॉन्ग, हर्ष के समय में हरियाणा में आया था । उसने हरियाणा के 3 स्थानों (थानेश्वर, सुग, गोकंठ (गोहाना) का भ्रमण किया । उसके अनुसार यहां के लोग जादुई कला में निपुण थे । लोग व्यापार करते थे । अधिकतर लोग ब्राह्मण धर्म मानने वाले थे । हेनसांग 629 ईस्वी में भारत आया और लगभग 15 वर्ष यहां रहा और 645 ईसवी में वह वापस चीन लौट गया ।

नोट-: हेनसांग सॉन्ग की पुस्तक सी-यू-की है । जिसमें उसने 138 देशों का वर्णन किया है ।




 

 

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