उत्तर वैदिक काल
हेलो दोस्तों , उम्मीद है आप सब अच्छे होगे और अपने तैयारी अच्छे से कर रहे होगे | दोस्तों आज अपना HISTORY का 3rd लेक्चर है | आशा करता हुँँ आपने पिछली क्लासों को देख लिया होगा, जिससे की आपका नॉलेज काफी IMPROVE हुआ होगा | तो दोस्तों आज का अपना टॉपिक है उत्तर वैदिक काल ,जिसे हम पूरी डिटेल के साथ पढ़ेगे जिससे की कोई भी प्रशन आपकी रेंज से बहार न हो | तो चलिए शुरु करते है -
उत्तर वैदिक काल वह काल है, जिसमे यजुर्वेद , सामवेद , अथर्ववेद की रचना हुई। और साथ में ब्राह्मण ग्रन्थ , अरण्यक , और उपनिषदोंं , की रचना हुई।
# इस काल को 'PGW लौह चरण' के नाम से जाना जाता है।
यहाँ जाति व्यवस्था अब उनके काम के आधार पर नही बल्कि उनके परिवार के वंश पर निर्भर करती थी।
सामाजिक स्थिति-:
# उत्तर वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था प्रचलित हो चुकी थी।
# समाज 4 वर्णों में विभाजित हो गया था - ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैैैैश्य , शुद्र।
# 3 वर्ण उच्च माने जाते थे, परन्तु शुद्रो की स्थिति बुरी थी। वे वेद नही पढ़ सकते थे और दुसरो के नौकर बनकर रहते थे।
# ऋग्वेद के 10 वे मंडल में चारों वर्णों का उल्लेख है। जिसके अनुसार ब्राह्मण ब्रह्मा जी के मुख , क्षत्रिय भुजाओ , वैैेश्य जंघाओ और शुद्र चरणों से उत्पन हुए है।
# स्त्रियों की स्थिति निम्न हो गई थी | उन्हें अब राजनितिक कार्यो में भाग लेने की अनुमति नही थी।
# बाल-विवाह आरम्भ हो गया था।
राजनैतिक स्थिति-:
# उत्तर वैदिक काल में बड़े-बड़े राज्य महाजनपद या राष्ट्र में बदलने लगे।
# यहाँ सभा और समिति का महत्व कम हो गया।
# राजा के राज्याभिषेक के समय राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया जाता था।
आर्थिक स्थिति-:
# उत्तर वैदिक काल में ज्यादातर भूमि पर खेती की जाति थी।
# जौ, चावल, गेहूं, आदि की कृषि लोगो का मुख्य व्यवसाय बन गया।
# यहाँ आंतरिक व्यापार के साथ-साथ विदेशी व्यापार भी व्यापक हो गया।
# उत्तर वैदिक काल में हल को 'सिरा' और हल की रेखा को 'सीता' कहा जाता था।
# उत्तर वैदिक काल में 'निष्क और शतमान' मुद्रा की ईकाइयाँँ थी। लेकिन किसी विशेष आकृति या मूल्य के सिक्कों का कोई भी प्रमाण नही मिला है।
# उत्तर वैदिक काल में कोशाम्बी नगर में सबसे पहले पक्की ईटो का प्रयोग हुआ।
धार्मिक स्थिति-:
# उत्तर वैदिक काल में देवता इंद्र के स्थान पर प्रजापति लोकप्रिय देवता हो गए।
# इस समय यज्ञ और अनुष्ठान अधिक विस्तृत हो गए।
# पुरोहितवाद एक वंशानुगत पेशा बन गया | पुरोहितों ने अनुष्ठानो और बलिदानों के नियमों को निर्धारित किया।
# उत्तर वैदिक काल का 'साख्य दर्शन' भारत के सभी दर्शनों सबसे प्राचीन है। इसके अनुसार मूल तत्व 25 है , जिनमे पहला तत्व 'प्रकृति' है।
# भारत दर्शन की 6 शाखाएँँ है | जिन्हें षड्दर्शन कहा जाता है। जो निम्न है-
प्रमुख दर्शन | उनके प्रवर्तक |
1. न्याय दर्शन | गौतम ऋषि |
2. वैशेषिक दर्शन | महर्षि कणाद |
3. योग दर्शन | पतंजली |
4. साख्य दर्शन | कपिल मुनि |
5. पूर्व मीमांसा | जैमिनी |
6. उत्तर मीमांसा | बदरायण ऋषि |
7. चावार्क दर्शन | चावार्क ऋषि |
साहित्य स्थिति-:
# इस काल में यजुर्वेद , सामवेद , अथर्ववेद , ब्राह्मण , अरण्यक , उपनिषद् आदि की रचना हुई।
1. यजुर्वेद-
# पाठ के लिए मन्त्रों और बलि के समय अनुपालन के लिए नियमों का संकलन यजुर्वेद कहलाता है।
# यजुर्वेद के पाठकर्ता को 'अध्वर्यु' कहा जाता है।
# यह पहला ऐसा वेद है , जों गद्द और पद दोनों में है।
# इसमें 40 अध्याय है और 1975 मंत्र है।
# यजुर्वेद दो भागों में है- शुक्ल और कृष्ण।
2. सामवेद-
# साम का अर्थ है - लय या गान ।
# यज्ञों के अवसर पर गाये जाने वाले मंत्रो का संकलन है।
# सामवेद के पाठकर्ता को उद्रातृ कहा जाता है।
# इसे भारतीय संगीत का जनक भी कहा जाता है।
# इसमें 1549 मंत्र संकलित है।
# सामवेद द्वारा हमे भूकम्प और अकाल का पहला लिखित प्रमाण मिलता है।
3. अथर्ववेद-
# अथर्ववेद चारों वेदों में सबसे बाद का वेद है।
# यह अथर्वा ऋषि द्वारा लिखा गया था।
# इस वेद में कुल 731 मंत्र और लगभग 6000 पद है।
# इस वेद में अंधविश्वास और काला जादू का वर्णन है।
# अथर्ववेद में परीक्षित को कुरुओ का राजा कहा गया है।
# इसमें सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है।
नोट -: पहले 3 वेदों को 'वेद्यत्री' के रूप में जाना जाता है ।
वेदांग-
# वेदों को भली-भाँति समझने के लिए 6 वेदांगो की रचना की है -
1. शिक्षा
2. ज्योतिष
3. कल्प
4. व्याकरण
5. निरुक्त
6. छंंद
ब्राह्मण ग्रन्थ-:
# वेदों को पढ़ने में मुश्किल होती थी। अतः उनका सरल रूप ब्राह्मण ग्रन्थ है। जों निम्न है -
वेद | ब्राह्मण ग्रन्थ |
1. ऋग्वेद | ऐतरेय, कोशितिकी या साख्य |
2. यजुर्वेद | शतपथ, तेतेरिय |
3. सामवेद | पंचविश, जमुनिया |
4. अथर्ववेद | गोपथ |
आरण्यक-:
# आरण्यक जंगलो में मिलने वाला ज्ञान था । जों मुख्य साधू -संतो और जंगलो में रहने वाले विधार्थियों के लिए होता था।
# आरण्यक की संख्या 7 है। जों निम्न है-
वेद | आरण्यक |
1. ऋग्वेद | ऐतरेय आरण्यक कोषित्की आरण्यक शांखायन आरण्यक |
2. सामवेद | तावलकर आरण्यक छान्दोग्य आरण्यक |
3. यजुर्वेद | वृहदारणयक आरण्यक तेतिरिय आरण्यक मैत्रायणी आरण्यक |
4. अथर्ववेद | कोई उपलब्ध नही |
उपनिषद्-:
# इन्हें वेदांत भी कहा जाता है।
# उपनिषद् का अर्थ है - समीप बैठना अर्थात पास बैठ कर दिया गया ज्ञान।
# उपनिषद की कुल संख्या 108 है।
# 108 उपनिषद में कुल 13 को ही प्रमाणिक माना जाता है।
# भारत का प्रसिद्ध आदर्श वाक्य 'सत्यमेव जयते' मुण्डकोपनिषद से लिया गया है।
तो दोस्तों ये था आज का अपना टॉपिक , उम्मीद है आपको अच्छे से समझ आ गया होगा । शेयर जरुर करे ।
धन्यवाद

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