मौद्रिक और साख नीति (Monitory and credit policy)

 हल्लों  दोस्तों स्वागत है आप सभी का आपके अपने प्लेटफॉर्म AAPART STUDY पर । दोस्तों जैसे कि आप सभी जानते हैं, हम कर रहे हैं अपने आने वाले एग्जामो की तैयारी और मुझे उम्मीद है कि आप अपनी तैयारी अच्छे से कर रहे होंगे । आज हमारी Economics  की पाचवीं क्लास है जो मौद्रिक और साख नीति के बारे में है। अगर आपने पिछली क्लासें नहीं देखी है तो आप लिस्ट में जाकर उन क्लासों को देख सकते हैं ।   


       मौद्रिक और साख नीति

                                           


तरलता- 

इसका संबंध मुद्रा से होता है । अर्थशास्त्र मुद्रा, रूपया, करेंसी आदि को तरल मानता है, क्योंकि इसे कभी भी प्रयोग किया जा सकता है ।

या 

मुद्रा को सबसे तरल इसलिए माना जाता है, क्योंकि यह किसी दूसरी वस्तु के रूप में कभी भी आसानी से विनियम हो सकती है ।


तरलता की परिभाषा-

किसी परिसंपत्ति को मूल्य में घाटा उठाए बिना तुरंत नगदी में परिवर्तित कर पाने की क्षमता, तरलता है ।


तरलता प्रबंधन / साख नियंत्रण-

हमारे पास धन बढें लेकिन कीमतों और महंगाई में इतनी वृद्धि ना हो कि उसकी वजह से हमारे पास बढें धन पर कोई प्रभाव ना हो । अतः हमें वृद्धि भी करनी है और महंगाई को भी नियंत्रित करना है । इन दोनों को कंट्रोल करने के लिए तरलता प्रबंधन या साख नियंत्रण को अपनाया जाता है ।

एक देश के केंद्रीय बैंक द्वारा अपनाए जाने वाले साख नियंत्रण / तरलता नियंत्रण को मुख्य दो भागों में बांटा जाता है-

1. मात्रात्मक उपाय

2. गुणात्मक उपाय


1. मात्रात्मक उपाय- 

साख नियंत्रण के इन उपायों द्वारा एक अर्थव्यवस्था की कुल मुद्रा पूर्ति या साख को प्रभावित किया जाता है इसके मुख्य उपाय निम्न है-

1. नगद कोष अनुपात (CRR)

2. वैधानिक तरलता अनुपात (SLR)

3. खुली बाजार प्रकियाएं (OMO)

4. रेपो दर (RR)

5. रिवर्स रेपो दर (RRR)

6. बैंक दर (BR)

7. सीमांत स्थाई सुविधा (MSF)


1. नगद कोष अनुपात (CRR)-

■ CRR- Cash Reserve Ratio

■ इसका अर्थ है बैंकों में जो भी पैसा जमा हुआ है । RBI उस पर कुछ प्रतिशत अनुपात लगाता है जो बैंकों को आरबीआई में नगद जमा करवाना पड़ता है । 

■ वर्तमान में CRR 4% है । 

■ उदाहरण- माना बैंकों में कुल जमा राशि 10,000 है तो उसे 400₹ आरबीआई में जमा करवाने होंगे । 

■ इसके पीछे निम्न उद्देश्य है- 

1. इसके पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य यह है कि अगर बैंक करप्ट हो जाए तो आम आदमी का पैसा सुरक्षित रहे और व्यक्ति का बैंकिंग सिस्टम से भरोसा न उठे । 

2. दूसरा CRR के द्वारा हम तरलता / नकदी को प्रबंधित कर सकते हैं । 

■ इससे बैंकों को कोई लाभ नहीं होता अगर माने तो यह एक प्रकार की सिक्योरिटी है । 

■ समय-समय पर बैंकों द्वारा इसका विरोध हुआ क्योंकि बैंकों को तो उस व्यक्ति को ब्याज देना है, जिसने पैसा जमा किया है । परंतु आरबीआई बैंक को कोई ब्याज नहीं देता है । वह एक प्रकार की सिक्योरिटी अपने पास रखता है ।

परंतु हमें इस बात से सहमत रहना चाहिए क्योंकि आरबीआई जो भी काम कर रही है,वह जनता की भलाई के लिए ही कर रही है और आरबीआई उस पैसे को भारत सरकार को देती है । जिसे भारत सरकार द्वारा गरीबों में विभिन्न योजनाओं के तहत लाभ दिया जाता है ।


2. वैधानिक तरलता अनुपात (SLR)-

■ SLR- Statutory Liquid Ratio 

प्रत्येक बैंक को अपनी परिसंपत्तियों के एक निश्चित प्रतिशत को अपने पास नगद रूप में या अन्य तरल परिसंपत्तियों (जैसे सरकारी प्रतिभूतियों, स्वर्ण) आदि के रूप में कानूनी तौर पर रखना पड़ता है । 

■ वर्तमान SLR 19% है 

■ इसे रखने के निम्न उद्देश्य हैं-

1. अगर बैंक ने किसी को ऋण दिया है, जरूरी नहीं है कि वह उसे ऋण चुकाएगा, वह भाग भी सकता है । अतः विषम परिस्थितियों में यही काम आता है ।

2. अगर कोई ऋण डूब जाता है तो बैंकों को ज्यादा नुकसान न हो ऐसा इसलिए किया जाता है ।

3. आम जनता को कोई नुकसान ना हो ।

4. विषम परिस्थितियों में बैंक ना डूबे, इसलिए SLR को रखा जाता है ।


नोट-  इन दोनों को (CRR और SLR) दीर्घकालिक तरलता प्रबंधन उपाय कहते है ।


★ जब भी CRR और SLR  को आरबीआई बढ़ाती है तो इससे Hard Monitory Policy (कठोर मौद्रिक नीति) कहते हैं । कठोर मौद्रिक नीति तब लाई जाती है, जब बाजार में तरलता बहुत ज्यादा हो और इस तरलता की अधिकता के कारण महंगाई बढ़ रही हो ।

                                      


                                      


★ जब CRR और SLR को RBI घटाता है, तो इसे हम Soft Monitory Policy कहते हैं । यह तब लाई जाती है । जब बाजार की में तरलता कम हो या बाजार में पैसा न हो ।


3. बैंक दर (BR)-

■ BR- Bank Rate

■ बैंक दर ब्याज कि वह न्यूनतम दर है, जिस पर देश का केंद्रीय बैंक (RBI) वाणिज्यिक बैंकों को दीर्घकालिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ऋण उधार देता है और उस ऋण पर बैंक RBI को जो ब्याज अदा करता है, उसे बैंक दर कहा जाता है ।

■ बैंक की दर बढ़ेगी तो ब्याज की दर बढ़ेगी और ऋण महंगा होगा ।

                                         


4. खुली बाजार प्रक्रियाएं (OMO)-

■ OMO- Open Market Operation

■ खुली बाजार प्रक्रियाओं का मतलब केंद्रीय बैंक (RBI) द्वारा प्रतिभूतियों का खुले बाजार में बेचना और खरीदना है ।

■ प्रतिभूतियां- प्रतिभूतियां लिखित प्रमाण पत्र होती है, जो ऋण लेने के बदले दी जाती है । इसमें जारी करने वाले के शर्तों में मूल्यों का उल्लेख किया जाता है और इसे खरीदा और बेचा जाता है ।

जब केंद्रीय बैंक वाणिज्यिक बैंकों को प्रतिभूतियां बेचता है तो वह उतने मूल्य की नगद राशि बैंकों से ले लेता है । जिससे उन वाणिज्यिक बैंकों की ऋण देने की अक्षमता गिर जाती है । इसके विपरीत आर्थिक मंदी की स्थिति में आरबीआई इन प्रतिभूतियों को खरीदकर वाणिज्यिक बैंकों का नगद कोष बढ़ा देता है । जिसे तरलता बढ़ जाती है ।


5. रेपो दर (RR)-

■ RR- Repo Rate

■ जब किसी बैंक के पास धनराशि की कमी होती है और उसे किसी अन्य बैंक या कहीं से सहयोग नहीं मिलता, तो वह आरबीआई के पास अल्पकालिक ऋण की मांग करता है । यह ऋण 1 सप्ताह या 15 दिन तक हो सकता है । आरबीआई उस बैंक को पैसा देती है और उस पर ब्याज दर लगाती है, जिसे रेपो दर कहा जाता है । बदले में बैंक आरबीआई के पास कुछ प्रतिभूतियां जमा करवाता है ।

                                            


6. रिवर्स रेपो रेट (RRR)-

■ RRR- Reverse Repo Rate

■ जब बैंक के पास धनराशि ज्यादा हो जाती है तो वह है आरबीआई के पास धन जमा करवाता है । जिसके बदले में आरबीआई उसे ब्याज देता है और यह अल्पअवधि के लिए होता है । इसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं । 

■ आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को प्रतिभूतियां देता है और जब वह उस राशि को वाणिज्यिक बैंकों को लौटाता है तो उन प्रतिभागियों को वापस ले लेता है ।

                                          


7. सीमांत स्थाई सुविधा (MSF)-

■ MSF- Marginal Standing Facility

जब बैंक को अत्याधिक और तुरंत पैसे की जरूरत होती है तो वह बैंक, आरबीआई से ऋण लेता है, परंतु यह ऋण SLR की प्रतिभूतियों का 2.5% दिया जाएगा । 

मतलब अगर बैंक ने आरबीआई से SLR की 1000 करोड़ की प्रतिभूतियां ली है तो वह MSF के जरिए 2.5% यानी 25 करोड राशि ले सकता है । अगर उसके पास सरकार की कोई अन्य प्रतिभूति नहीं है । 

■ यह अत्यंत अल्पकालिक ऋण होता है । यह ज्यादा से ज्यादा 1 रात के लिए होता है । 

■ यह सुविधा 2011 में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा बनाई गई।

                                        



2. गुणात्मक उपाय- 

गुणात्मक उपाय वे उपाय हैं जो किसी विशेष उद्देश्यों के लिए दी जाने वाली या विशेष बैंकों को दी जाने वाली तरलता को नियंत्रित करते हैं । इसे चयनात्मक साख नियंत्रण भी कहते हैं । इसके उपाय निम्न है-

1. सीमांत आवश्यकता

2. लता की राशनिंग

3. प्रत्यक्ष कार्यवाही

4. नैतिक दबाव


1. सीमांत आवश्यकता- 

बैंक द्वारा किसी भी प्रतिभूति पर दिए गए ऋण तथा प्रतिभूति वाली वस्तु के वर्तमान मूल्य में अंतर है ।

मान लीजिए किसी व्यक्ति ने ₹100 मूल्य का माल बैंक के पास प्रतिभूति के रूप में रखा, तो बैंकों उसे ₹80 का ऋण देता है । इस स्थिति में सीमांत आवश्यकता 20% होगी ।


2. तरलता की राशनिंग- 

तरलता की राशनिंग से अभिप्राय विभिन्न व्यवसायिक क्रियाओं के लिए तरलता की मात्रा का कोटा निर्धारण करना है । तरलता की राशनिंग तब की जाती है , जब अर्थव्यवस्था में विशेष रुप से सट्टे की क्रियाओं के लिए दी जाने वाले ऋणों पर रोक लगानी होती है । 

उदाहरण- 

अगर आप 0% डाउनपेमेंट पर मोबाइल खरीद रहे हैं तो उसकी मांग बढ़ेगी और महंगाई होगी । अतः उस पर 0% को हटाकर 20% या 30% डाउनपेमेंट की जाती है । जहां अगर आप 10000 का मोबाइल ले रहे हैं तो आपको ₹2000 नगद देने होंगे । इससे लोग कम आकर्षित होंगे और उनकी उसकी मांग घटेगी और महंगाई कम होगी । 


3. प्रत्यक्ष कार्यवाही-

आरबीआई उन सभी बैंकों पर प्रत्यक्ष कार्यवाही करता है जो उसकी नीतियों का पालन नहीं करते । प्रत्यक्ष कार्यवाही के अंतर्गत ऐसे व्यापारिक बैंकों की देश की बैंकिंग प्रणाली के सदस्यों के रूप में मान्यता को रद्द कर दिया जाता है ।


4. नैतिक दबाव-

कभी-कभी आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को समझा कर या नैतिक दबाव डालकर या प्रार्थना पत्र द्वारा उन्हें तरलता या साख नियंत्रण के लिए अपनाई गई नीतियों के अनुसार काम करने के लिए सहमत कर लेता है । सभी बैंक तरलता और साख के विस्तार या संकुचन करने की सलाह को मान लेते हैं ।


दोस्तो यह थी आज की अपनी क्लास । उम्मीद है आप सबको क्लास अच्छी लगी होगी । क्लास को शेयर करें और अगर आपकी पढ़ाई से संबंधित कोई भी समस्या है, तो उसे कमेंट बॉक्स में अवश्य लिखें । धन्यवाद



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